शारदीय नवरात्रि घर पर: कलश स्थापना, नौ दिन की पूजा, कन्या पूजन
पहले दिन कलश कैसे स्थापित करें, हर सुबह-शाम क्या करें, व्रत के नियम, और अष्टमी या नवमी पर समापन कैसे करें।
शारदीय नवरात्रि, 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर9 मिनट
शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाली देवी की नौ रातें हैं। 2026 में यह रविवार 11 अक्टूबर से सोमवार 19 अक्टूबर तक है, और दशहरा 20 अक्टूबर को। घर में इसके तीन हिस्से होते हैं: पहले दिन कलश स्थापना, हर सुबह और शाम एक छोटी पूजा, और कन्या पूजन जिससे व्रत पूरा होता है।
हर क्षेत्र और हर परिवार इसे अपनी दादी-नानी की परंपरा से करता है, और यह ठीक है। यहाँ वह रूप दिया है जो ज़्यादातर घरों में साझा है; जहाँ विकल्प हैं, वहाँ बताया गया है। इसमें से कुछ भी पंडित के बिना किया जा सकता है।
कब
- कलश स्थापना (घटस्थापना) प्रतिपदा, 11 अक्टूबर की सुबह के मुहूर्त में होती है। पंचांग सूर्योदय के बाद लगभग एक घंटे का समय देता है; वह छूट जाए तो दोपहर का अभिजीत मुहूर्त मान्य है। दोपहर बाद और रात में स्थापना न करें।
- रोज़ की पूजा: सुबह स्नान के बाद एक बार, और शाम को आरती के साथ एक बार। हो सके तो हर दिन एक ही समय रखें; नियमितता भी साधना का हिस्सा है।
- कन्या पूजन अष्टमी (18 अक्टूबर) या नवमी (19 अक्टूबर) को होता है। कई परिवार अष्टमी को करते हैं; जो पूरे नौ दिन का व्रत रखते हैं वे नवमी को करके उसके बाद व्रत खोलते हैं।
- कलश और उगाए गए जौ का विसर्जन दशमी, 20 अक्टूबर को सुबह की पूजा के बाद होता है।
सामग्री: क्या तैयार रखें
- कलश · 1ताँबे या पीतल का, जिसके मुँह पर नारियल टिक सकेTamra Kalash with Coconut Stand →
- आम के पत्ते · 5 या 7कलश के मुँह के लिए
- जटा वाला नारियल · 1लाल कपड़े या चुनरी में लिपटा
- लाल चुनरी या कपड़ा · 1नारियल और देवी की तस्वीर या मूर्ति के लिए
- मिट्टी का पात्र और साफ़ मिट्टी · 1जौ बोने के लिए
- जौ · एक मुट्ठी
- अखंड ज्योति का दीया · 1वैकल्पिक; तभी जलाएँ जब कोई नौ दिन उसे सँभाल सकेBrass Diya →
- गाय का घी · 500 mlअखंड ज्योति और रोज़ की आरती के लिएA2 Gir Cow Ghee, Puja Grade →
- रुई की बत्तियाँ · 1 पैकेट
- कुमकुम, हल्दी, चंदन, अक्षत (चावल)तिलक और अर्पण के लिएAshtagandha Tilak Set →
- फूल और मालादेवी के लिए लाल गुड़हल या गुलाब पारंपरिक हैं
- अगरबत्ती और धूपMysore Sandalwood Agarbatti →
- कपूरशाम की आरती के लिएBhimseni Camphor →
- आरती की थालीBrass Aarti Thali Set →
- फल, मेवे और मिठाईरोज़ के भोग के लिए; हर दिन अलग भोग एक सुंदर परंपरा है
- दुर्गा सप्तशती या देवी महात्म्य, या दुर्गा चालीसाजो आप सच में पढ़ेंगे
- पान, सुपारी, लौंग, इलायचीहर पूजा के अंत में अर्पण के लिए
- कन्याओं के लिए उपहार · जितनी कन्याएँ बुलाई होंआमतौर पर लाल चुनरी, चूड़ियाँ, मिठाई और थोड़ी दक्षिणा
पहला दिन: कलश स्थापना
स्नान करें, पूजा स्थान साफ़ करें और चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएँ। उस पर देवी की मूर्ति या तस्वीर रखें। नीचे की सब क्रियाएँ पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके करें।
- 1
जौ बोएँ
मिट्टी के पात्र में मिट्टी भरें, जौ बोएँ, थोड़ा पानी छिड़कें। नौ दिन में उगे अंकुर घर पर देवी का आशीर्वाद माने जाते हैं। पात्र कलश के पास रखें, उसके नीचे नहीं।
- 2
कलश भरें
पानी डालें, हो तो गंगाजल की कुछ बूँदें, एक सिक्का, सुपारी, थोड़े अक्षत और एक फूल। कलश के गले पर मौली (लाल धागा) बाँधें।
- 3
कलश बंद करें
आम के पत्ते डंठल नीचे करके मुँह में सजाएँ, फिर लाल कपड़े में लिपटा नारियल ऊपर रखें, जटा अपनी ओर (परिवार की परंपरा के अनुसार उत्तर या पूर्व)।
- 4
आवाहन
दीया और अगरबत्ती जलाएँ। हाथ जोड़कर देवी को नौ दिन कलश में विराजने का निमंत्रण दें। अपनी भाषा में एक सरल वाक्य काफ़ी है; जो संस्कृत आवाहन जानते हैं वे उसका प्रयोग करें।
- 5
संकल्प
अपना संकल्प कहें: कितने दिन का व्रत, कौन-सा रूप, और यह परिवार के कल्याण के लिए है। दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लेकर एक बार बोलें, फिर जल थाली में छोड़ दें।
- 6
अखंड ज्योति जलाएँ
केवल तभी, जब कोई घर पर उसे सँभालने के लिए रहे। दीया बुझ जाना अपशकुन नहीं है, पर बिना देखरेख की लौ आग का ख़तरा है। हर पूजा में जलाकर बुझाया गया दीया भी मान्य विकल्प है।
हर दिन: सुबह और शाम
- 7
सुबह
स्नान के बाद कलश और जौ के पात्र पर जल छिड़कें, ताज़ा फूल चढ़ाएँ, देवी को तिलक करें, दीया और अगरबत्ती जलाएँ, और सप्तशती का एक अध्याय या दुर्गा चालीसा पढ़ें। भोग में फल या मिठाई।
- 8
शाम
कपूर से आरती, उस दिन का भोग, और देवी के नाम। परिवार 'अम्बे तू है जगदम्बे' या 'जय अम्बे गौरी' आरती गाते हैं; किसी को न आती हो तो रिकॉर्डिंग चलाना ठीक है।
- 9
नौ रूप
हर दिन नवदुर्गा के एक रूप का होता है: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। पूजा से पहले उस दिन के रूप के बारे में कुछ पंक्तियाँ पढ़ने से नौ दिनों को आकार मिलता है। हर दिन एक रंग पहनना नई परंपरा है; मन हो तो अपनाएँ।
- 10
भोग
केवल सात्विक: फल, दूध की मिठाई, हलवा, नारियल। ऐसा कुछ नहीं जिसमें प्याज़, लहसुन या अनाज हो, ताकि व्रत रखने वाले भी प्रसाद ले सकें।
व्रत: क्या खाया जाता है
ज़्यादातर परिवार पहले और आख़िरी दिन, या पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं। नियम किसी भी वैष्णव व्रत जैसे हैं: अनाज (गेहूँ, चावल, दालें) नहीं, प्याज़-लहसुन नहीं, सामान्य नमक नहीं। जो चलता है: फल, दूध और दही, साबूदाना, कुट्टू और सिंघाड़े का आटा, सामक के चावल, आलू, सेंधा नमक, मेवे, और चाय या कॉफ़ी अगर आप लेते हैं।
आम तरीका यह है: दिन में फल और दूध, और शाम की आरती के बाद एक पूरा भोजन (फलाहार)। गर्भवती, मधुमेह वाले, बुज़ुर्ग या बीमार लोग अपने डॉक्टर की सलाह के अनुसार व्रत बदलें; भाव मायने रखता है, कठोरता नहीं।
अष्टमी या नवमी: कन्या पूजन
- 11
निमंत्रण
दो से दस वर्ष की नौ कन्याएँ और एक बालक (लंगूर, भैरव के रूप में)। कम भी ठीक है; दो-तीन कन्याओं का ठीक से किया पूजन, नौ के जल्दबाज़ी वाले पूजन से बेहतर है।
- 12
स्वागत
उनके पैर धोएँ, तिलक करें, दाहिनी कलाई पर मौली बाँधें, और साफ़ कपड़े पर पूर्व की ओर मुँह करके बिठाएँ।
- 13
भोजन
पारंपरिक भोजन है पूरी, सूजी का हलवा और काले चने। घर में किसी और के खाने से पहले उन्हें परोसें।
- 14
उपहार और आशीर्वाद
चुनरी, चूड़ियाँ या कोई छोटा उपहार, और दक्षिणा। फिर उनके पैर छुएँ; इस दिन वे देवी हैं।
- 15
हवन
जो परिवार हवन करते हैं वे कन्या पूजन से पहले इसी दिन दुर्गा सप्तशती के नवार्ण मंत्र से करते हैं। अगर पहले कभी नहीं किया, तो अकेले बड़े हवन से बेहतर है पंडित के साथ छोटा हवन।
दशमी: समापन
- 16
अंतिम पूजा
रोज़ की तरह सुबह की पूजा, फिर देवी का धन्यवाद करें और अगले वर्ष फिर पधारने की प्रार्थना करें।
- 17
जौ बाँटें
अंकुर काटें। हर सदस्य को कुछ तिनके पर्स या किताब में रखने के लिए दें; कुछ देवी को और घर के बड़ों को अर्पित करें।
- 18
विसर्जन
कलश का जल तुलसी या किसी और पौधे की जड़ में डालें, नाली में कभी नहीं। नारियल तोड़कर प्रसाद के रूप में बाँटें, या परिवार की परंपरा हो तो बहते जल में अर्पित करें। मिट्टी का पात्र मिट्टी को लौटा दें।
- 19
व्रत खोलें
जिन्होंने पूरे नौ दिन व्रत रखा वे नवमी के कन्या पूजन के बाद या दशमी की पूजा के बाद, प्रसाद से शुरू करके व्रत खोलते हैं।
अक्सर क्या गलत होता है
- सुबह छूट गई तो दोपहर बाद या रात में कलश स्थापित करना। अभिजीत मुहूर्त लें; वह भी निकल जाए तो अगली सुबह स्थापित करें और वहीं से दिन गिनें।
- ख़ाली फ़्लैट में अकेली जलती अखंड ज्योति। इसकी जगह रोज़ का दीया चुनें।
- हर चीज़ नौ-नौ ख़रीदना। एक देवी, एक कलश, एक दीया, पूरे मन से: यही साधना है।
- कलश का जल सिंक में डालना। वह पौधे या ज़मीन को जाता है।
- ज़रूरत से ज़्यादा कठोर व्रत। अष्टमी को बेहोश होने वाले ने फल खाने वाले से बेहतर व्रत नहीं रखा।
सवाल-जवाब
क्या कलश के बिना नवरात्रि पूजा हो सकती है?
हाँ। देवी की तस्वीर के सामने हर सुबह-शाम जलाया दीया, रोज़ का पाठ और भोग एक पूर्ण पूजा है। कलश नौ दिनों का पारंपरिक केंद्र है, पर उसके न होने से पूजा अधूरी नहीं होती।
अगर जौ न उगे तो क्या करें?
आमतौर पर इसका मतलब है मिट्टी बहुत गीली थी या पात्र को रोशनी नहीं मिली। यह अपशकुन नहीं है। पूजा जारी रखें और दशमी पर पात्र जैसा है वैसा ही अर्पित करें।
क्या मांसाहारी परिवार नवरात्रि रख सकता है?
हाँ। नौ दिन घर सात्विक रहता है: मांस, अंडा, शराब, प्याज़ और लहसुन नहीं। ज़्यादातर घरों में यही व्यवस्था होती है।
कलश किस दिशा में रखें?
पूजा स्थान के उत्तर-पूर्व या पूर्व में, और पूजा करने वाले का मुँह पूर्व या उत्तर की ओर। नारियल की जटा अपनी ओर रखना आम परंपरा है; कुछ परिवार पूर्व की ओर रखते हैं। दोनों मान्य हैं।
नवरात्रि के बाद चुनरी और नारियल का क्या करें?
चुनरी पूजा स्थान में रखी जा सकती है या अगले वर्ष फिर प्रयोग की जा सकती है। नारियल दशमी को तोड़कर प्रसाद के रूप में खाया जाता है, या परिवार की परंपरा हो तो नदी में अर्पित किया जाता है।
क्या महिलाएँ मासिक धर्म के दौरान व्रत रख सकती हैं?
परंपरा परिवार के अनुसार अलग है। कई घरों में व्रत और पाठ जारी रहता है, पर उन दिनों वेदी पर पूजा घर का कोई और सदस्य करता है। कोई एक नियम नहीं है; जिसमें आपका परिवार सहज हो, वही करें।
पुराणों और घरेलू परंपरा के आधार पर शिवालय डेस्क द्वारा लिखा गया। रीति-रिवाज क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग होते हैं; जहाँ आपका अलग हो, अपना ही मानें। यहाँ किसी फल का वादा नहीं है।